Wednesday, April 29, 2009

संगम

जाने क्यों एक ऐसा संगम है
और मै हूँ तन्हा वो भी है तन्हा,
और हैं ये फासले हमारे बीच का
और ये इंतज़ार मेरी नींदों का
और उसके ख्वाबों का,बहकी गुनाहों का
इन महकती फिजाओं में,बहकती अदाओं में
ये अनकही सी अनसुनी सी आरजू मेरे दिल की
जिसे हसरत है उन्हें पाने का ये एहसास लिए
जो हर वक़्त हर लम्हा उसे ही धुन्दती हैं
जाने क्यों एक ऐसा संगम है
और मै हूँ, तन्हा वो भी है तन्हा,

इस उमड़ते हुए जज्बातों के सैलाब में
इस बहकते हुए भावनाओ के आगोश में
मेरी खामोश धड़कने न जाने क्यों
हर पल हर क्षण उसे ही पुकारती हैं
जाने क्यों एक ऐसा संगम है
और मै हूँ तन्हा वो भी है तन्हा,

इन बढती हुई चाहतो की वादियों में
इन महकती हुई फूलो की गुलिस्तान में
उनकी ही खुशबू की एहसास छाई है
ना जाने क्यों ये बेताबियाँ और बेचैनी
उस संगदिल के प्यार की आस लगाये बैठा है
क्यों ये अंशू थमने का नाम नहीं लेते
उस अजनबी की राह को तकते हैं रहते
क्यों ये लाचार दिल बस ये जिद किये बैठा है
हर पहर हर शांझ बस वो ही वो नजर आता है
जाने क्यों एक ऐसा संगम है
और मै हूँ तन्हा वो भी है तन्हा,

ना जाने क्यों ये मौसम इतना हसीन हो चला है
पल पल याद दिलाये लम्हों का साज छेड़ चला है
आखिर क्यों ये तन्हाईयाँ इस मोड़ पे रास नहीं आती
हर लम्हा मेरी धड़कन एक ही फरियाद किये जाती है
आखिर क्यों ये दिल की दस्तक उन्हें अनसुनी किये जाती है
जाने क्यों एक ऐसा संगम है
और मै हूँ तन्हा वो भी है तन्हा!

4 comments:

  1. Super Like.... very Touchy poem....:)

    ReplyDelete
  2. if its not a copy paste....then u can rock...

    give time for urself...
    n feel d best....

    dont stop writing...
    keep it..

    ReplyDelete
  3. it's not at all copy paste man..one of my frnds gave me one line "Jane kyu ek aisa sangam hai"...n he challenged me to write poem on this n I did. :)

    ReplyDelete